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सरकारी रिपोर्ट में ‘मौत’, प्राइवेट में ‘जिंदगी’: बस्ती जिला अस्पताल का खौफनाक खेल!

  1. अजीत मिश्रा (खोजी)

🏥स्वास्थ्य विभाग या ‘सफेदपोश’ लापरवाही का अड्डा? सरकारी रिपोर्ट में ‘मौत’ और निजी में ‘जिंदगी’!🏥

  • बस्ती जिला अस्पताल: जहाँ मशीनें नहीं, मरीजों की किस्मत बोलती है!
  • साहब! ये पैथोलॉजी है या ‘अंधेर नगरी’? 3.8 और 12.7 के फेर में फंसी मरीज की जान।
  • सफेद हाथी साबित हो रहीं करोड़ों की मशीनें, गलत रिपोर्ट से मरीजों को ‘जहर’ परोस रहा अस्पताल।
  • बस्ती स्वास्थ्य विभाग का ‘कागजी कत्ल’: बिना जांच के ही तय हो रही मरीज की बीमारी!
  • हीमोग्लोबिन 3.8 vs 12.7: जिला अस्पताल की रिपोर्ट पर उठे गंभीर सवाल, कौन है जिम्मेदार?
  • बस्ती मंडल: पैथोलॉजी रिपोर्ट में भारी हेरफेर, सरकारी दावों की खुली पोल।
  • मरीजों के जीवन से खिलवाड़: जिला अस्पताल की ‘हाई-टेक’ लैब में जांच का तमाशा।

ब्यूरो रिपोर्ट: बस्ती मंडल, उत्तर प्रदेश

बस्ती। अगर आप उत्तर प्रदेश के बस्ती जिले में रहते हैं और सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर भरोसा कर अपनी जांच रिपोर्ट के आधार पर इलाज करा रहे हैं, तो सावधान हो जाइए! यहाँ का स्वास्थ्य विभाग मरीजों को बीमारी से नहीं, बल्कि अपनी ‘कागजी लापरवाही’ से मारने पर उतारू है। जिला अस्पताल की पैथोलॉजी लैब से जो रिपोर्ट सामने आई है, वह केवल एक तकनीकी गलती नहीं बल्कि सीधे तौर पर गरीब मरीजों के जीवन के साथ खिलवाड़ है।

✍️ जब रिपोर्ट ने सुखा दिया मरीज का खून

ताजा मामला कप्तानगंज ब्लॉक के एक मरीज जितेंद्र राजभर (24) का है। जिला अस्पताल की ‘हाई-टेक’ बायोकेमिस्ट्री मशीनों ने युवक का हीमोग्लोबिन मात्र 3.8 g/dL बता दिया। चिकित्सा विज्ञान के अनुसार, इस स्तर पर मरीज की स्थिति अत्यंत गंभीर होती है और उसे तत्काल खून चढ़ाने की जरूरत पड़ती है। तीमारदार बदहवास होकर खून के इंतजाम में जुट गए, लेकिन जब संदेह होने पर निजी पैथोलॉजी में जांच कराई गई, तो हीमोग्लोबिन 12.7 g/dL निकला।

सवाल यह है कि 3.8 और 12.7 के बीच का जो फासला है, क्या वह केवल ‘मशीनी खराबी’ है या स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली में लग चुका घुन?

✍️भारी ‘शुगर’ का खेल और आंकड़ों की बाजीगरी

सिर्फ हीमोग्लोबिन ही नहीं, जिला अस्पताल की रिपोर्ट में शुगर लेवल को भी बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया, जबकि बाहर की जांच में सब कुछ सामान्य निकला। हैरानी की बात यह है कि टीएलसी (TLC) काउंट में भी जमीन-आसमान का अंतर पाया गया। जिला अस्पताल की रिपोर्ट में जो आंकड़ा 1400 था, वह बाहर 8.363 निकला।

यह आंकड़े चीख-चीख कर कह रहे हैं कि जिला अस्पताल की पैथोलॉजी लैब केवल ‘सफेद हाथी’ साबित हो रही है। यहाँ लगी लाखों-करोड़ों की मशीनें और तैनात विशेषज्ञ क्या केवल कागजी खानापूर्ति के लिए हैं?

 ✍️जिम्मेदार कौन?

जिला अस्पताल के जिम्मेदार अधिकारी अक्सर ‘मशीनी त्रुटि’ का बहाना बनाकर पल्ला झाड़ लेते हैं। लेकिन:

🔥क्या मशीनों का कैलिब्रेशन समय पर नहीं होता?

🔥क्या लैब टेक्नीशियन बिना जांच के ही रिपोर्ट तैयार कर रहे हैं?

🎯अगर कोई गरीब मरीज निजी जांच न करा पाता और गलत रिपोर्ट के आधार पर उसे गलत दवाएं या अनावश्यक खून चढ़ा दिया जाता, तो उसकी मौत का जिम्मेदार कौन होता?

एसआईसी डॉ. खालिद रिजवान अहमद का कहना है कि “शिकायत मिलने पर जांच की जाएगी।” लेकिन सवाल यह है कि क्या हर बार किसी की जान जोखिम में पड़ने के बाद ही जांच की नींद खुलेगी?

✍️ भरोसे का कत्ल

बस्ती जिला अस्पताल की यह रिपोर्ट केवल एक मरीज की कहानी नहीं है, बल्कि उस व्यवस्था पर तमाचा है जो ‘सस्ते और सुलभ इलाज’ का दावा करती है। जब सरकारी रिपोर्ट पर भरोसा करना ‘जानलेवा’ साबित होने लगे, तो जनता कहाँ जाए? प्रशासन को चाहिए कि वह केवल जांच का आश्वासन न दे, बल्कि इस ‘रिपोर्ट घोटाले’ के दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करे ताकि पैथोलॉजी लैब ‘निदान केंद्र’ बनी रहे, ‘शमशान का रास्ता’ नहीं।

बस्ती की जनता पूछ रही है: साहब, ये रिपोर्ट सही है या आपकी नीयत?

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